Monday, 24 May 2021

विश्वास के सहारे जीती जंग

26 अप्रेल को सुबह से ही बिल्कुल एनर्जी नहीं लग रही थी लगा पिछले 11 दिन से 3 कोरोना पेशेंट की देखभाल करते करते थकावट हो गई होगी क्योंकि 4 दिन पहले टेस्ट करवाया था तो रिपोर्ट निगेटिव थी, तो चिंता नही थी।


दोपहर होते होते गले में खराश और हल्का बुखार भी हो गया। बस शाम को ही बेटा बोला टेस्ट करवा लेते है।वो खुद पॉजिटिव था पर 11 दिन हो गए थे और उसके कोरोना के सिम्पटम भी जा चुके थे।


टेस्ट सेंटर बन्द होने में आधा घण्टा बाकी था।हम पहुंच गए कार में ही सेम्पल ले लिया। घर आगये।


मुझे पूरा विश्वास था रिपोर्ट निगेटिव होगी क्योंकि वेक्सीन के दोनों डोज़ लग चुके थे पर दूसरे दिन शाम को रिपॉर्ट आई पॉजिटिव। हम बिल्कुल भी घबराए नही। दोपहर से ही डॉ से पूछकर दवाएं शुरू कर दी थी। बुखार आता उतर जाता।


आइसोलेशन में चली गई।


सुबह उठते ही गर्म पानी पीना, भाप लेना, गरारे करना, प्राणायाम करना। भरपुर नाश्ता खाना लेना।


फल कोई न मिल रहे थे सिर्फ खरबूजा मिला सो खाया।


ऑक्समिटर से ऑक्सीजन लेवल चेक करते रहना। दिन भर यही दिनचर्या रहती।


अपना कमरा साफ करना अपने बर्तन, कपड़े धोना सब में समय कहाँ निकल जा रहा मालूम ही नही पड़ा।


ईश्वर की कृपा और आप सब दोस्तों की शुभकामनाओं से 10 मई को पूर्णतः स्वस्थ होकर बाहर आ गई।


घर में भी सब ठीक है।


साइड इफेक्ट में मुझे लूज मोशन की शिकायत रही और कमजोरी अभी भी है।


वेक्सीन लेने से इम्युनिटी सही रही।


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रश्मि प्रभा जी द्वारा उनकी फेसबुक वाल पर शोभना जी से सम्बंधित लगाई गई पोस्ट. इसे यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है. 

शोभना जी से संपर्क के लिए यहाँ क्लिक करें. 

रश्मि प्रभा जी से यहाँ से मिला जा सकता है.

Tuesday, 18 May 2021

आवश्यक कदम उठाते हुए कोरोना पर विजय पाई

कोरोना विजेता के रूप में आज मिलिए गुजरात के अंशुमन दवे जी से और जानिये कैसे सभी आवश्यक कदम उठाते हुए उन्होंने कैसे कोरोना को पराजित किया.

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मुझे गत वर्ष 2020 नवम्बर में कोरोना संक्रमण हुआ. यह एक तरह से Severe Covid कहा जायेगा, जिसमें पचास प्रतिशत से ज़्यादा फेफडों मे कोरोना वायरस फैल चुका था. पहले तो पता ही नहीं चला. बुखार की दवाएँ, पैरासीटामोल, क्रोसिन आदि लेकर निश्चिंत था. आराम समझ न आने पर जब टेस्ट करवाया तो पता चला कि कोरोना संक्रमण हुआ है. ये तो गनीमत कही जाएगी कि हॉस्पिटल सेक्टर में विगत बीस साल से कार्य करने के कारण काफी सारे उत्तम चिकित्सक मेरे मित्र हैं. मेरे जीजाजी डॉ. राजेंद्र अमीन साहब अहमदाबाद के सिविल हस्पताल में प्रोफ़ेसर हैं. जिनकी सलाह से मैंने अपने घर पर ही रहते हुए अपनी मेडिकल टीम से अपना इलाज कराया.


इस उपचार में 9 Remdesivir, 9 Steroids, 9 Clexen (anti coagulant) और 9 Pantodac Injection शामिल थे. इसके अलावा Ziffy Antibiotic, Vitamin C, Zincovit, Eliquis (Blood Thinner) तथा Aspirin भी मेरे उपचार में शामिल थे. ICMR की गाइडलाइन के चलते मैंने हिम्मत से सारे इंजेक्शन लिए. कई बार महसूस हुआ कि अगर Happy Hypoxia हुआ और यूँ ही दम तोड़ दिया तो क्या होगा? इसलिये पल्स ऑक्सीमीटर से लगातार ऑक्सीजन लेवल की जाँच भी करता रहता. इन सब के अलावा ECG, शुगर टेस्ट और Electrolytes टेस्ट भी करवाया.


उन दिनों रात को बुरे-बुरे सपने आना, अत्यधिक मात्रा मे पेशाब होना, ठीक से नींद न आना एक आम बात हो गई थी. मैं आभारी हूँ मेरी पत्नी सुश्री कानन दवे का जो नियमित रूप से पौष्टिक आहार मेरे लिए बनातीं और मेरे पास आइसोलेशन रूम में भेजतीं.


कुल दस दिनों के बाद डॉक्टर्स की सलाह से मैने फिर से D Dimer और CRP टेस्ट  करवाये जिनकी रिपोर्ट सामान्य आने के पश्चात मेरे डॉक्टर पारस शाह जी ने मुझे आइसोलेशन से बाहर आने की सलाह दी. इसके बाद भी मैंने RTPCR टेस्ट करवाया. उसके 10 दिन बाद HRCT of Lungs करवाया. सारी रिपोर्ट्स सामान्य आने के बाद ही मैं आइसोलेशन से बाहर आया.


कोरोना संक्रमण से मुक्त होने के 5 महीने बाद तक शारीरिक शक्ति वापिस नहीं आ सकी. ऐसी स्थिति में एक शोफर रखा और कार के द्वारा अपनी हॉस्पिटल जॉब का फील्ड वर्क पूरा किया. धीरे-धीरे शारीरिक शक्ति सामान्य होने लगी. फेफड़ों को मजबूत बनाने के लिए कसरतें, जैसे कि Spiro Meter, योग, अनुलोम-विलोम को नियमित रूप से करता रहा. इनके अलावा साइकिलिंग भी बराबर करता रहा.


इस दौरान मेरे माता-पिता, सास-ससुर और अन्य रिश्तेदार भी मेरी ऊर्जा का स्त्रोत बने. जीजाजी  डॉ. राजेन्द्र अमीन साहब, डॉ. पारस शाह, डॉ. पार्थव पटेल (मित्र), डॉ. श्वेता गार्गिय आदि के कारण आज मैं जीवित हूँ.


आप सबसे मेरी विनती है कि कोरोना के लक्षण दिखने पर RTPCR तुरंत करवा लें और अपने डॉक्टर साहब की सलाह का पालन करें. बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से ही इलाज शुरू न कर दें. सावधानी से किसी भी भयंकर रोग से मुक्ति मिल सकती है, बस हौसला बनाये रखिये. धन्यवाद.


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कोरोना विजेता के रूप में अंशुमन दवे जी अपनी जिजीविषा और धर्मपत्नी सहित परिजनों, मित्रों के सहयोग से कोरोना संक्रमण से मुक्त होकर अपने कार्यक्षेत्र में पुनः सक्रिय हुए हैं. चिकित्सकों की सलाह को उन्होंने वरीयता देते हुए सभी नियमों का पालन किया और आज हम सबके बीच कोरोना विजेता के रूप में उपस्थित हैं. 


अंशुमन दवे जी से मिलने के लिए यहाँ क्लिक करें. 

Monday, 17 May 2021

जूनून, जिद और जज्बे ने हराया कोरोना को

ये सच्ची कहानी है नीरज द्विवेदी की, उन्हीं की जुबानी.

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ये हैं मेरे घर के कोरोना पीड़ित, योद्धा और विजेता भी.

 

मेरे होम आइसोलेशन में रहते मेरी देखभाल करना, हौसला बढ़ाना, हंसाना, खाने-पीने की हठ करना और हड़काना इस योद्धा के प्रमुख हथियार थे. मेरा शरीर अपनी ताकत और इनके जुनून से कोरोना से जीत गया. इसी बीच इनके संक्रमित होने की सूचना मैंने जब इन्हें दी तो ये जोर से ठिलठिलाटे हुए अपनी बत्तीसी निकालकर बोलीं "हम नईं मरत, हमाई चिंता नई करो अबै तौ हमें मौड़ई मौड़न कौ व्याव करने! इतने जल्दी पीछौ नई छोड़ें....."

 

मैंने कहा सब लोग पॉजिटिव हो गए तो बोली "कोई बात नहीं सब सही हो जाएंगे."

 

धीरे धीरे सब सही हुए लेकिन सबसे बाद में यही योद्धा ठीक हुआ, जो रोज की तरह फोटो में भी मेरे सर पर चढ़ा है! कल ही इनकी खांसी ठीक हुई.

 

इनके जुनून, जिद और जज्बे से हम सब स्वस्थ हो पाए.

 

ऐसे योद्धा आपके घर,पड़ोस या मोहल्ले में भी होंगे. ऐसे योद्धाओं को मेरा सैल्यूट.



नीरज द्विवेदी ललितपुर निवासी हैं. परिवार से सबसे पहले इनको कोरोना ने प्रभावित किया उसके बाद सभी सदस्य संक्रमित मिले. इनकी धर्मपत्नी के विश्वास ने एक-एक करके सबको संक्रमण-मुक्त करवा दिया. 

नीरज जी की कहानी के लिए यहाँ क्लिक करें.


नीरज द्विवेदी के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें. 



Sunday, 16 May 2021

प्लाज्मा डोनेट करने को हुए पहले कोरोना संक्रमित फिर हुए स्वस्थ

बात पिछले वर्ष यानि 2020 से शुरू करते हैं जब वायरस की शुरुआत हुई थी परन्तु स्थितियाँ आज की तरह भयावह नहीं थीं. 19 मार्च 2020 से ही रेलवे में स्थिति समझ आने लगी थी. लिहाजा मैंने अपनी टीम को पहले से ही यथासम्भव सहायता के लिए तैयार कर लिया था और उसी हिसाब से कार्य करना शुरू किया. इसके साथ ही सरकार द्वारा इस बारे में जारी किये गए समस्त दिशानिर्देशों को भी सभी को बताना शुरू कर दिया था. सावधानी को देखते हुए स्वयं भी सुरक्षा के सभी उपाय, जैसे मास्क को उचित तरीके से लगाना, सेनेटाइजेशन इत्यादि अपनाने शुरू कर दिए थे.

 

जब लॉकडाउन लागू हुआ तो हम लोग सावधानी से कार्य करते रहे. जब श्रमिक स्पेशल शुरू हुई तब रेलवे द्वारा तथा हमारे साथ अन्य संस्थाओं द्वारा खाद्य सामग्री इत्यादि के विरतण में सारी सावधानियां तार-तार नजर होती दिखीं. इसके बाद भी हमलोग जितना हो सके उतनी सावधानी बरतते रहे. इसी कारण से हम सभी सुरक्षित बने रहे.

 

धीरे-धीरे स्थितियाँ सामान्य होने लगीं किन्तु कुछ चीजों को मैंने आदत बना लिया. मास्क एवं घर मे बनाये गए सेनिटाइजर का लगातार उपयोग किया जाता रहा. (यदि आवश्यकता हो तो सेनिटाइजर की डिटेल दे दूंगा) इस कारण से स्वास्थ्य में कोई परेशानी नहीं हुई बल्कि इसका लाभ ही मिला. मैं स्वयं स्नोफिलिया का मरीज हूँ पर घर मे ही बनाये गए डबल लेयर मास्क के लगातार उपयोग से यह समस्या इस वर्ष नहीं हुई.

 

वर्ष 2021 में इस वायरस ने अपने द्वितीय चरण की शुरुआत की तब मैं स्थानांतरण के कारण बाँदा में था. बाँदा में मेरे स्टाफ के अधिकतर लोग या तो स्वयं इस वायरस से पीड़ित थे अथवा उनका परिवार. ऐसी विषम परिस्थिति में भी मैं हमेशा मास्क, होममेड सेनिटाइजर और कॉटन ग्लब्ज के साथ साफ रुमाल डिटॉल लगाया हुआ उपयोग करता रहा. यह भी प्रयास लगातार किया कि किसी ऐसी वस्तु का स्पर्श न करूं जिसे सार्वजनिक रूप से छुआ गया हो अथवा स्पर्श किया जाता हो.  

 

इस सावधानी का प्रतिफल अच्छा ही मिला और मैं मार्च 2021 तक स्वस्थ बना रहा. उरई में न रह पाने के कारण किसी तरह के सामाजिक कार्य नहीं कर पाने से मन में बैचेनी थी. अतः इस बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए मैंने प्लाज्मा एवं ब्लड डोनेट करने की सार्वजनिक पोस्ट डाली. उस समय अज्ञानतावश मुझे यह पता नहीं था कि कोरोना पॉजिटिव से स्वस्थ हुआ व्यक्ति ही कोरोना इलाज के लिए प्लाज्मा डोनेट कर सकता है. मेरी पोस्ट को देखकर झांसी से किसी सज्जन का कॉल आया, जिनके लिए मैं 19 मार्च 2021 को झांसी पहुँचा. वहाँ पहुँचने पर जानकारी हुई कि वह महिला मरीज जनपद जालौन की ही निवासी है. फ़िलहाल, ब्लड बैंक पहुंचने पर फॉर्म इत्यादि भरने के बाद जब डॉक्टर ने मुझसे जानकारी ली तब ही मुझे बताया गया कि मैं प्लाज्मा नहीं दे सकता. यह जानकारी होने पर मैं मायूस हो गया और इस सम्बंध में अनिल राज से भी बात हुई.

 

खैर मैं वापस लौट आया. तीसरे दिन सूचना प्राप्त हुई कि उस महिला मरीज का निधन हो गया. इस खबर से मेरा मन अत्यधिक व्यथित हो गया. मैं स्वयं को दोषी ठहरा रहा था कि मेरे कारण उस मरीज के परिजन में उम्मीद जागी थी जिसे मैंने नाउम्मीद कर दिया और उनका एक अमूल्य दिन बर्बाद कर दिया. मैं बहुत ही परेशान था और इसकी कहीं न कहीं भरपाई करना चाहता था. इसलिए मैंने स्वयं को बन्धन मुक्त कर हरसम्भव प्रयास किया पॉजिटिव होने का. मेडिकल कॉलेज में ब्लड डोनेट किया. कोरोना पॉजिटिव मरीज की असावधानी से हेल्प की, जिसका नतीजा 26 मार्च को निकला कि मैं कोरोना पॉजिटिव हो गया.

 

बाँदा में चेक कराने के बाद अवकाश पर घर आया. मोबाइल पर प्राप्त सूचना से पॉजिटिव होने का पता चला. अब मेरा प्रयास था स्वस्थ होने का. इसलिए मैंने अपने चिकित्सक मित्र एवं बड़े भाई तथा भतीजे से सम्पर्क किया जो चिकित्सक हैं. उनके द्वारा बताई गईं दवा ली गई. चूँकि मेरी बचपन से आदत में रहा है अंग्रेजी दवाओं का यथासम्भव तब तक सेवन न करना जब तक कि अत्यावश्यक न हो. इस कारण मैंने दादी-नानी के नुस्खे अपनाए. सबसे पहले जब बुखार शुरू हुआ और कमर से लेकर घुटनो, पिंडलियों तथा पंजों में भयानक दर्द होने लगा तो घरेलू काढ़ा, जिसमें मेरे द्वारा कुछ अतिरिक्त चीजें भी मिलाई गईं, का इस्तेमाल किया. फ्रिज का पानी न पीकर सादा पानी पिया. इससे बुखार में राहत मिली और दर्द भी कुछ कम हुआ. बुखार कम होना शुरू हुआ मगर रोज शाम 7 से सुबह 6 बजे तक उसके आने का नियम बना रहा. खाने में रोटी, पालक या लौकी मिलाकर बनाई जाती. यथासम्भव हरी सब्जियां, मोंठ, रोसा, सोयाबीन की दाल का उपयोग, मूंगदाल लौंग, लहसुन के साथ पीना, रोटी कम दाल, सब्जी का ज्यादा सेवन, शरीर मे तरलता बनाये रखने के लिए तरबूज का सेवन लगातार शुरू किया. इसी तरह कूलर, ऐसी का इस्तेमाल बन्द सिर्फ पंखे का उपयोग, डिटॉल साबुन एवं लिक्विड का प्रयोग, नियमित वस्त्र बदलने आदि से बुखार की मात्रा कम होती गई. शरीर मे जकड़न अभी भी बनी हुई थी और भारीपन भी था. इस कारण घर से पैदल चलकर अपने रेलवे आवास पर जाता था, जहाँ मैंने सैकड़ों पेड़ लगाए हैं, उन्ही के बीच दिनभर बैठे या या लेटे रहता. पैदल चलने से पसीना आने से भारीपन कम होने लगा और हरियाली में रहने से शुद्ध हवा मिली, जिस वजह से शरीर मे फुर्ती बढ़ने लगी.

 

इसी बीच 6 अप्रेल को अवकाश समाप्त होने के कारण प्राइवेट वाहन से कार्यस्थल पहुँचा, जहाँ पहले से ही बोल दिया था कि मैं कार्यसमय में अकेला ही कुछ दिन कार्य करूँगा. लगातार स्वयं को व्यस्त रखने और एक पल के लिए भी न घबराने से 16 तारीख को कार्य स्थल पर ही हुई जांच में निगेटिव हो गया. इसके बाद 24 को झांसी में प्लाज्मा डोनेट किया. अब वह मरीज स्वस्थ है. मुझे नहीं पता वो कौन है? उसे देखा नहीं सिर्फ परिजन को देखा पर सुकून है कि मैं ऐसा कर पाया.

 

मुझे नहीं पता कि मेरी बात से किसे अच्छा लगेगा, किसे नहीं पर इतना कहूंगा कि जब मैं जबरन पॉजिटिव हो सकता हूँ और बिना घबराए चंद दिनों में स्वस्थ हो सकता हूँ तो अन्य क्यों नहीं? बस पॉजिटिव के साथ पॉजिटिव सोच की जरूरत है. शरीर है तो बीमारियाँ लगी रहेंगी पर यदि बीमारियों से दूर रहना है. यदि बीमार हो गए तो स्वस्थ होना है. इसलिए सोच को आशावादी रखिये और सावधानी जरूर बरतिए. अच्छा खाइए शुद्ध खाइए. पेड़ जरूर लगाइए, कच्ची जमीन नहीं तो गमलों में लगाकर घर को हरा भरा रखिये. हर छोटी से छोटी बीमारी के लिए अस्पताल मत भागिए. आप के घर मे ही उनकी दवा है. सीखिए, इस्तेमाल कीजिये और स्वस्थ रहिये, स्वस्थ रखिये.


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कोरोना संक्रमित को प्लाज्मा देने की सदेच्छा रखने के चलते स्वयं को कोरोना संक्रमित कर लेने की जिद तथा उसके बाद जल्द से जल्द स्वस्थ कर लेने का विश्वास रखने वाले रवि शक्या रेलवे के अपनी सेवाएँ दे रहे हैं. सामाजिक कार्यं में सक्रियता से भागीदारी करने वाले रवि जी ने अपनी कहानी हमें whatsapp पर हमारे अनुरोध पर भेजी. आप भी परिचित हों, उनकी आत्मशक्ति से. 


रवि शक्या जी से मिलने के लिए यहाँ क्लिक करें.

Friday, 14 May 2021

आत्मविश्वास से जीती जंग कोरोना से

देवेन्द्र जी 

इनका परिचय देने की शायद ही जरूरत हो फिर भी परिचय संक्षिप्त में करा देता हूँ, ये हमारे परम् मित्र देवेन्द्र गुप्ता जी हैं, या कह लो मेरे साथ खड़े रहने वाले वो शख्श है जो मुझे मेरे होने का एहसास समय-2 पर दिलाते रहते हैं. विगत 1 माह से ये कोरोना के साथ जंग कर रहे हैं. जंग की शुरुआत छोटे भाई कन्हैया से शुरू हुई. देवेन्द्र जी के छोटे भाई कन्हैया 22 दिन पहले (लगभग 20 अप्रैल को) कोरोना संक्रमण के चलते मेडिकल में भर्ती कराए गए. इलाज चालू हुआ.


इलाज के दौरान कई दौरे देखे, कभी गंभीरता देखी, कभी कोरोना का भयावह रूप देखा. तबियत में भी पर्याप्त उतार चढ़ाव देखे. 13-14 दिन इलाज के बाद भी डॉक्टर्स से संतोषजनक उत्तर नही मिले. रेडमिसिविर से लेकर सारे हथकंडों का उपयोग होता रहा. इधर हफ़्तों की भाग-दौड़ और भाई की तबियत ठीक न होने की वजह से देवेन्द्र जी का भी स्वास्थ्य गड़बड़ा गया.


यह दौर हमारे लिए बेहद स्तब्ध करने वाला था. पहले से एक भाई लड़ ही रह था और देवेंद्र जी के स्वास्थ्य ने चिंता बढ़ा दी. स्वास्थ्य खराबी में कहीं न कहीं एक मानसिक दबाव भी दिखा. देर न करते हुए देवेंद्र जी को होस्पिटलाइज करवाया गया. उधर छोटे कन्हैया के स्वास्थ्य को लेकर फिर गतिबिधियों को जारी रखा. माँ वनखण्डी के चरणों मे एक ही प्रार्थना रही कि माँ इस संकट से निकालो. देवेंद्र जी को आराम दिखने लगा. आराम तो मिला पर देवेंद्र जी के दिमाग मे वही चिंता चल रही थी कि छोटा भाई कैसे ठीक हो? यह चिंता देवेन्द्र जी पर मानसिक दबाव बनाती जा रही थी. समझ ही नहीं पा रहे थे कि क्या किया जाये?


माई की ऐसी कृपा हुई छोटा भाई भी ठीक होने लगा. छोटे भाई की हिम्मत की दाद देनी होगी. आईसीयू वार्ड में 22 दिन में कई मंजर देखे पर उसने अपना हौसला और ठीक होने का आत्मविश्वास नहीं खोया. वो धैर्य बनाये लड़ता रहा. उसके धैर्य ने उसकी जीत सुनिश्चित की. जगतजननी मां वनखंडी व पूज्य गुरुदेव की कृपा ऐसी हुई कि देवेन्द्र जी डिस्चार्ज हुए और 2 दिन बाद छोटा भाई भी डिस्चार्ज होकर घर आया.


देवेंद्र जी तो अस्वस्थ हुए ही नहीं थे बल्कि भाग-दौड़ का दबाव उनके स्वास्थ्य पर हावी हुआ. खैर परीक्षा आती रहती है. जीवन के इस संघर्ष में धैर्य, आत्मविश्वास के साथ टिके रहिये, परिणाम आपके पक्ष में होंगे.


इस कहानी का सिर्फ इतना उद्देश्य है कि समय उतार-चढ़ाव का आता है पर इस समय में धैर्य, आत्मविश्वास व दृढ़ता बनाये रखें. ईश्वर पर भरोसा रखकर सतत लड़ाई जारी रखिये. प्रत्येक लड़ाई जीती जा सकती है, बस मन से न हारिये. लगे रहिए.


आप सभी के स्वस्थ होने की कामना करता हूँ. माहौल उदासी का है पर फिर भी मुस्कुराते रहिये. अपनों का हौसला बढाते रहिये. जीत हम सबकी होगी, बस धैर्य न खोना, आत्मविश्वास बनाये रखना.


माँ वनखंडी आप सभी का कल्याण करें.


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कोरोना विजेता भाई की उक्त कहानी जनपद जालौन निवासी धर्मेन्द्र चौहान ने अपनी फेसबुक वाल पर प्रकाशित की थी. कोरोना के विरुद्ध जनमानस में एक ऊर्जा का संचार करने के लिए इस कहानी को यहाँ आप सबके लिए प्रकाशित किया जा रहा है. साभार धर्मेन्द्र जी की फेसबुक वाल से. 


उक्त कहानी को इस लिंक के द्वारा पढ़ा जा सकता है. 


धर्मेन्द्र चौहान जी के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें.

पारिवारिक सहयोग और आत्मविश्वास से हराया कोरोना को

कोरोना ने सबसे पहले जकड़ा था ज्योति, मेरी भाभी, सबसे छोटे भाई की पत्नी को. उसे तुरंत आइसोलेट किया गया. वृद्ध सास-ससुर के मन को संभालने-समझने वाली विनम्र ज्योति के सामने वायरस-असुर टिक नहीं पाया, दो दिन के ज्वर के बाद भाग निकला. फिर 6-7 दिन बाद संदीप, ज्योति के पति, मेरे छोटे भाई पर उसने पूरी तैयारी के साथ धावा बोला. ठण्ड के साथ तेज बुखार. उसके आइसोलेशन में जाने के साथ गृहस्थी की पूरी जिम्मेदारी मम्मी के कन्धों पर आ गई.


संदीप ने एक-दो दिन देखने के बाद संजय भैया को खबर की जो मुझसे छोटा भाई है. संजय और नीना ने दूसरे शहर में रहते हुए भी चिकित्सा पर निगरानी शुरू की. उन्होंने डॉक्टर से सम्पर्क रखा और रात को जाग-जाग कर ऑक्सीजन-लेवल पर नज़र रखी. तीन-चार दिन के बाद जैसे ही ऑक्सीजन लेवल घटना शुरू हुआ, मेरी प्रिंसिपल भाभी नीना ने एम्बुलेंस बुलाकर संदीप को ज्योति के साथ अस्पताल भिजवाया और दोनों दमुआ से नरसिंहपुर आ गए. बिना आराम किए दिन-दिन भर काम कर सकने वाली हमारी 82 साल की मम्मी के लिए घर संभालना कठिन नहीं है पर इस समय आशंका और चिंता से टूटी हुई थीं, ऐसे में बड़े बेटे-बहू के आने से उन्हें निश्चित ही हौसला मिला.


संजय ने संदीप को अस्पताल ले जाकर ड्रिप लगवाईं दो-तीन दिन. तब इन्फेक्शन कम होने के कारण डॉक्टर ने घर में रखकर चिकित्सा कराने की सलाह दी थी. ऑक्सीजन-लेवल मेंटेन करने के लिए संजय के घनिष्ठ मित्र सुनील जायसवाल ने कन्सेन्ट्रेटर दिया. एकबारगी लगा, अब अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. सीटी स्कैन स्कोर 6 था और चिकित्सा डॉक्टर के परामर्श पर ही चल रही थी पर दो दिन बाद लगा, भर्ती करना ही उचित होगा.


डॉ. नीखरा के कोविड अस्पताल में ऑक्सीजन-बेड के लिए संजय और सुनील ने काफ़ी प्रयास किया पर वे खाली नहीं थे. इतना डरावना समय है, सचमुच कहीं कोई खाली बेड खाली नहीं है पर सामान्य बेड उसे मिल गया और निजी स्तर पर ऑक्सीजन-सिलिंडर की सतत आपूर्ति संजय और संदीप के मित्रों के माध्यम से हमने रखी.


संजय ने अस्पताल-घर एक कर दिया. चिकित्सा के दौरान हर समय संदीप के पीछे खड़े रहे. नीना ने घर से मोर्चा संभाले रखा. संजय की दौड़-धूप और युवा डॉ. अभिषेक नीखरा की कुशल चिकित्सा से संदीप 7 दिन बाद स्वस्थ हो गए. अभी भी बहुत निगरानी आवश्यक है.


मैं अपने सभी मित्रों- रिश्तेदारों के प्रति कृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे संदेश भेजे, फोन किये, लगातार अपडेट लेते रहे और मनोबल बढ़ाते रहे. मैंने रात ढाई बजे ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए पोस्ट डाली थी, इतनी रात से मुझे मित्रों ने मदद के संदेश देने शुरू किये. यह उपकार है. बचपन से सखी, अनिता केसकर मैं जानती हूँ , उसे कभी भी पुकार सकती हूँ. अचला जायसवाल ने कई बार फोन किया... वीना बुंदेला... श्री नरेंद्र सतीजा जी, जिनकी सूचना से सिलिंडर मिला... श्री पलाश सुरजन जी...डॉ. लोकेन्द्र सिंह जी... मधुर माहेश्वरी जी, मुकेश नेमा... अमृता जैन देव... पंकज नेमा... आभार कहना नाकाफी होगा.


नहीं भूल सकते कमलेश की नि:स्वार्थ और अथक सहायताओं को. उसने गृह-सहायक से अधिक पारिवारिक सदस्य की तरह जिम्मेवारी संभाली.


बहुत सावधानी रखें आप सब. घर में कोरोना की दस्तक एक बहुत बड़ी परीक्षा है.



नागपुर निवासी दीप्ति कुशवाह जी के शब्दों में ही उनके परिजनों की कहानी. कोरोना संक्रमण से किस तरह आत्मविश्वास, सहयोग और पारिवारिक अपनत्व के द्वारा पूरा परिवार  स्वस्थ हुआ. कोरोना विजेता के रूप में दीप्ति जी के सभी परिजनों का, सहयोगियों का हार्दिक वंदन-अभिनन्दन. 

 फेसबुक से साभार ली गई इस पोस्ट को यहाँ क्लिक करके देखा जा सकता है. 


दीप्ति कुशवाह जी के बारे में यहाँ से जानें.

कोविड उपचार के दौरान का सुखद अनुभव

कोविड के उपचार के दौरान कुछ अच्छे अनुभव हुए , जिन्हें डॉक्टर्स के सम्मान में साझा करना चाहूँगी . कोविड के लक्षण के अनुसार घर पर उपचार चल...